Friday, 23 April 2021

राजनीति नहीं, बल्कि आम आदमी की उदासीनता जिम्मेदार है

 

Source: Indiatoday

लोग मर रहे हैं। कोई रोक नहीं है। लेकिन यह स्वीकार करना असंभव है कि अधिकांश जिम्मेदारियां राजनीतिक नेताओं की सार्वजनिक बैठकें हैं। जिम्मेदारी आम आदमी की है। बिलकुल उनकी, और किसी की नहीं। मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं।

 मैं कुछ दिन पहले ट्रेन से लौट रहा था। एक साठ साल का सज्जन हाथ में कागज लेकर आगे की सीट पर बैठा है। नकाब पहने हुए। मैंने उसकी जेब में सेनिटाइजर की एक बोतल भी देखी। थोड़ी देर बाद उसने सीट पर पेपर रखा और इधर-उधर देखने लगा। फिर, बहुत जल्दी, उसने मुखौटा उतार दिया और अपनी उंगली से खैनी को अपने होंठों के कोने से हटा दिया। और उसने इसे सीट के नीचे फेंक दिया और सीट पर अपना हाथ मिटा दिया। उसके चेहरे पर एक नज़र जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने सैनिटाइजर डाला और अपने हाथों को पोंछकर मास्क के बाहर, शर्ट के सीने और पेट और सिर के बालों को धोया। और क्या! उसने खैनी का एक डिब्बा अपनी जेब से निकाला, उसे अपने बाएँ हाथ की हथेली पर रगड़ा और उसे अपने होंठों पर लौटा दिया। 

मैं अपने दोस्त अभि से आज इन सब के बारे में बात कर रहा था। इस संबंध में, उन्होंने एक सुंदर शब्द का उपयोग किया, "मानव व्यवहार के बीच भिन्नता कोरोना की ओर, यदि नहीं बदला गया, तो कोरोना फैलाना बंद नहीं करेगा।" संयोगवश, आज सुबह, डॉ। श्यामाशीस बंद्योपाध्याय ने कहा, "प्रारंभिक अनुचित सामाजिक व्यवहार के परिणामस्वरूप कोरोना बढ़ने लगता है।" दोनों शब्द यह समझाने के लिए पर्याप्त हैं कि कोरोना के इस भयानक दुर्भाग्य का स्वागत करने के लिए आम आदमी ही क्यों जिम्मेदार है। 

यहां सरलीकरण करना थोड़ा मुश्किल है। कोरोना के इस बढ़ते प्रकोप के लिए मानव उदासीनता वास्तव में जिम्मेदार है। लेकिन साथ ही हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि किसी विषय के प्रति मानवीय उदासीनता पैदा करने की एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जो रातोरात नहीं होती है। 

कोरोना वायरस पिछले साल आने पर लोग घबरा गए थे। उसके कारण, प्रभावित लोगों और उनके परिवारों के प्रति विभिन्न असामाजिक और अमानवीय व्यवहार भी देखा गया। तब मीडिया में आतंक का लगातार प्रचार चल रहा था। और एक और नई प्रणाली को लागू करना जिसे लॉकडाउन कहा जाता है। जन्मजात आदतों के विपरीत, राज्य ने लोगों पर कड़ा प्रहार किया। लोगों ने मास्क, सैनिटाइज़र, सतह-क्लीनर, सर्जिकल टोपी, दस्ताने और पीपीई-फेस शील्ड पहनी थी। लेकिन इतनी व्यवस्थाओं के बाद आखिर में क्या देखा गया? लोगों ने क्या देखा? सभी ने देखा कि लॉकडाउन उठाने के कुछ दिनों के भीतर, लोग अपने आप ठीक हो रहे थे, यहां तक ​​कि टीके के बिना, ड्रग्स के बिना। मास्क का उपयोग किए बिना भी पीड़ितों की संख्या नगण्य है। बीमारी के बारे में हू के शब्द, डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के शब्द मेल नहीं खाते थे, रोज हर रोज बदलते गए। हालांकि, लॉकडाउन के फैसले ने कई लोगों की आजीविका, उनके सपनों को पूरा करने की इच्छा और उनके मूल नागरिक अधिकारों को छीन लिया। दूसरी ओर, राम मंदिर की नींव पूजो को रोक नहीं पाई, सीएए का विरोध बंद हो गया। किसान-बिल का पारित होना बंद नहीं हुआ, प्रवासी श्रमिकों के दिल की धड़कन रुक गई। बहु-पैकेज पैकेज प्रवेश बजट और ऋण राहत की घोषणा के साथ, गरीबों का आयात नहीं बढ़ा, केवल अमीरों-अडानी जैसे अमीरों की संपत्ति में वृद्धि हुई। 

फिर जब यह टीका देश में आया, तो राजनीतिक नेताओं ने बिना मुखौटों के सार्वजनिक सभाएँ करना शुरू कर दिया, विवाह शुरू हो गए, स्कूल खुल गए आदि सब कुछ पूर्व-कोरोना अवस्था में वापस जाने लगे, तब पता चला कि कोरोना ने महाराष्ट्र पर फिर से हमला किया है। कुछ डॉक्टरों ने कहा कि दूसरी लहर आ रही थी, लोग सावधान रहें। मास्क पहनें, सैनिटाइजर लें, नहीं तो हालत खतरनाक होगी। तब मीडिया ने ध्यान नहीं दिया। राजनेताओं ने उपद्रव नहीं किया। और आम लोगों को लगा कि कुछ लोग फिर से पैसा कमाना शुरू कर देंगे। कोरोना-फरोना धोखाधड़ी के अलावा कुछ नहीं है। इसलिए भले ही लोग पिछले साल सावधान थे, इस बार हर कोई उसके खिलाफ चला गया। 'सोशल बिहेवियर' बदल गया और 'वेरिएशन' बढ़ गया।

वास्तव में, इस बीच, राजनेताओं, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और मीडिया सभी ने लोगों के साथ अपनी विश्वसनीयता खो दी है। लोग न केवल उदासीन हैं, वे लापरवाह हैं। और कोरोना की दूसरी लहर आई और आज भारत का दम घुटने लगा - सभी ने देखा, अब भी देखता है और उसी तरह से देखेगा। क्योंकि मनुष्य के दिल में किसी और के प्रति थोड़ा भी भरोसा नहीं है। वह किसी पर भरोसा नहीं करता। 

जैसे आज लोग पर्यावरण के बारे में नहीं सोच रहे हैं। इसी तरह, शिक्षा प्रणाली, स्वास्थ्य प्रणाली, राष्ट्रीय आय वितरण प्रणाली, नागरिक अधिकार, महिलाओं की गरिमा, शिष्टाचार, राजनीति में भ्रष्टाचार, सरकारी रिश्वत को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। लेकिन बात करने के लिए बहुत कुछ। फेसबुक पर बहुत सारे पोस्ट। लेकिन बिलकुल नहीं सोच रहा। वास्तव में, आज लोग कोरोना के प्रति उदासीन नहीं हैं, वे अपने अस्तित्व के लिए लगभग उदासीन हैं। और यह उदासीनता आज 3.32 लाख का रिकॉर्ड है। 

और इसलिए इस समय केवल एक मुखौटा पहनना और एक सैनिटाइज़र का उपयोग करना पर्याप्त नहीं है, यह जानना अधिक महत्वपूर्ण है कि यह कैसे करना है। लेकिन उस प्रचार को कौन करेगा, विश्वसनीय चेहरा कौन होगा? और इसलिए 8.45 पर अपने भाषण में, प्रधान मंत्री ने सभी को कोरोना नियमों का पालन करने की सलाह दी ताकि सरकार को फिर से लॉकडाउन न करना पड़े - क्योंकि वह यह भी समझते हैं कि लोग कोरोना की तुलना में लॉकडाउन से अधिक डरते हैं।

অতঃপর আমার হিন্দিভাষী বন্ধুদের আবদারে এই লেখা হিন্দিতে দিতেই হল যার বাংলা তর্জমাও নিচে দিলাম। 

রাজনীতি নয়, সাধারণ মানুষের উদাসীনতাই আসলে দায়ী

 

মানুষ মরছে। বিরাম নেই। তাই বলে, বেশিরভাগ দায়ই যে রাজনৈতিক নেতানেত্রীদের জনসভার এই কথা মানা অসম্ভব। দায় আসলে সাধারণ মানুষের, একেবারেই তাদের, আর কারও নয়। একটা ঘটনা বলি।

কয়েকদিন আগে ট্রেনে করে ফিরছি। সামনের সিটে পেপার হাতে বসে আছেন এক বছর ষাটের ভদ্রলোক। মাস্ক পরেছেন, পকেটে স্যানিটাইজারের বোতলও দেখেছি। কিছুক্ষণ পরে তিনি পেপারটা সিটে রাখলেন ও এদিক-ওদিক তাকাতে শুরু করলেন। তারপরে আচমকা অত্যন্ত দ্রুততার সঙ্গে মাস্ক নামিয়ে আঙুল দিয়ে ঠোঁটের কোল থেকে খৈনি বের করে সিটের নিচে ফেলে দিলেন এবং হাতটিকে সিটেই মুছলেন। কিছুই যেন হয়নি এমন একটা ভাব মুখময় মেখে তিনি স্যানিটাইজার ঢেলে হাত তো মুছলেনই সঙ্গে মাস্কের বর্হিভাগ, জামার বুক-পেটের অংশ ও মাথার চুল অব্দি আঁজলা শান্তিজলের মত ধুয়ে ফেললেন। ব্যস আর কি! পকেট থেকে খৈনির ডিবে বের করে বাঁ-হাতের তালুতে ঘষে আবার ফিরিয়ে দিলেন ঠোঁটের শূন্য কোল।

এইসব নিয়েই আজ বন্ধু অভীকের সঙ্গে কথা হচ্ছিল। এব্যাপারে সে একটা সুন্দর টার্ম ব্যবহার করে বলল, “ভ্যারিয়েশন অ্যামং হিউম্যান বিহেভিয়র টুওয়ার্ডস করোনা যদি না বদলানো যায় তবে করোনা ছড়ানো বন্ধ হবে না”। কাকতালীয়ভাবেই আজ সকালেই ডাক্তার শ্যামাশিস বন্দ্যোপাধায় বললেন, “ইনিসিয়াল ইনঅ্যাপ্রোপ্রিয়েট সোশ্যাল বিহেভিয়রের ফলে করোনা বাড়তে আরম্ভ করে”। দুটো ইংরেজি টার্মই যথেষ্ট এই কথা বোঝাতে যে কেন সাধারণ মানুষই একমাত্র দায়ী করোনার এই ভয়াবহ দুর্দিনকে স্বাগত জানানোর জন্য।

এইখানে সরলীকৃত করে নিলে একটু মুশকিল। মানুষের উদাসীনতা সত্যিই দায়ী করোনার এই ক্রমবর্ধমান প্রকোপের জন্য, কিন্তু একইসঙ্গে আমাদের এই কথাও মনে রাখতে হবে, কোনো বিষয়ে মানুষের উদাসীনতা জন্মানোর একটা ঐতিহাসিক প্রক্রিয়া থাকে, একদিনে তা হয় না। গত বছরে যখন করোনা নামের নভেল বা আনকোরা ভাইরাসটির আগমন হয় তখন মানুষ ভীষণ ভয় পেয়েছিল। সে-কারণে আক্রান্ত মানুষ ও তার পরিবারের প্রতি নানারকমের অসামাজিক ও অমানবিক ব্যবহারও দেখা গিয়েছিল। তারপরে ছিল মিডিয়ার লাগাতার হাড়-হিম করা প্রচার ও লকডাউন নামের আরেক নতুন ব্যবস্থার আরোপ। আজন্মকালীন অভ্যেসের বিপরীতে নিয়ে যাবার সজোর রাষ্ট্রীয় ধাক্কা নেমেছিল মানুষের ওপরে। মানুষ মাস্ক পরেছিল, স্যানিটাইজার, সারফেস-ক্লিনার, সার্জিকাল টুপি, হাতে গ্লাভস ও পিপিই-ফেসশিল্ডে ঢেকে ফেলেছিল আপাদমস্তক।  অথচ এত আয়োজনের পরে কী দেখা গেল অন্তিমে, বলা ভাল মানুষ কী দেখল? সবাই দেখল যে, লকডাউন তুলে নেবার কিছু দিনের মধ্যেই বিনা ভ্যাকসিনে, বিনা ওষুধেই মানুষ নিজে থেকেই সেরে যাচ্ছে। এমনকি মাস্ক না ব্যবহার করেও আক্রান্তের সংখ্যা যৎসামান্য। হু-এর কথা, ডাক্তার-বিজ্ঞানীদের কথা কিচ্ছু মিলল না, রোজ বদলে বদলে গেল। অথচ লকডাউনের সিদ্ধান্ত ততদিনে কেড়ে নিল বহু মানুষের রুজি-রোজগার, স্বপ্নপূরণের আকাঙ্ক্ষা ও সাধারণতম নাগরিক অধিকারগুলিকে। পক্ষান্তরে, রামমন্দির প্রতিষ্ঠার ভিত পুজো থামল না, থামল সিএএ প্রতিবাদ। কৃষক-বিল পাশ হওয়া থামল না, থামল পরিযায়ী শ্রমিকের হৃদ্‌স্পন্দন। লক্ষ কোটি টাকার প্যাকেজ ভর্তি বাজেটের ঘোষণা ও ঋণ মুকুবে গরীবের আমদানি বাড়ল না, কেবল বাড়ল আম্বানি-আদানিদের মত ধনকুবেরদের সম্পত্তি।

এরপরে যখন দেশে ভ্যাকসিন এসে গেল, রাজনৈতিক নেতৃবর্গ বিনা মাস্কে জনসভা করতে শুরু করলেন, বিয়েবাড়ি শুরু হল, স্কুল খুলল ইত্যাদি সবকিছুই প্রি-করোনা পর্যায়ে ফিরতে শুরু করল তখন জানা গেল মহারাষ্ট্রে নাকি আবার করোনা হানা দিয়েছে। কিছু কিছু ডাক্তার বললেন বটে দ্বিতীয় ঢেউ আসছে, মানুষ সাবধান। মাস্ক পরুন, স্যানিটাইজার নিন, নইলে অবস্থা বিপজ্জনক হবে। মিডিয়া পাত্তা দিল না। রাজনেতারা টুঁ-শব্দ করলেন না। আর সাধারণ মানুষ ভাবল, ওই আবার কিছু লোক কামাবে তার ফিকির শুরু হয়েছে। করোনা-ফরোনা কিচ্ছু নয় স্রেফ জালিয়াতি। গত বছরে মানুষ যা যা করেছিল এবারে প্রায় জেদ করে সবাই তার বিপরীতে হাঁটল। বদলে গেল ‘সোশ্যাল বিহেভিয়র’ আর বেড়ে গেল ‘ভ্যারিয়েশন’।

আসলে, ইত্যবসরে রাজনেতৃবর্গ, ডাক্তার, বিজ্ঞানী ও মিডিয়া সকলেই হারালেন মানুষের কাছে তাদের বিশ্বাসযোগ্যতার জায়গা। মানুষ কেবল উদাসীন হল না, বেপরোয়া হল। আর করোনার দ্বিতীয় ঢেউ এসে আজ ভারতবর্ষকে শ্বাসরুদ্ধ করে হত্যা করা শুরু করল – সকলে দেখল, দেখছে এবং একইভাবে দেখবেও। কেননা মানুষের মনে আর কারও প্রতি বিন্দুমাত্র ভরসা নেই। সে কাউকে বিশ্বাস করে না।

যেমনভাবে মানুষ আজ পরিবেশ নিয়ে ভাবে না। একইভাবে শিক্ষাব্যবস্থা, স্বাস্থ্যব্যবস্থা, জাতীয় আয়ের বন্টন ব্যবস্থা, নাগরিক অধিকার, নারীর মর্যাদা, শিষ্টাচার, রাজনীতির দুর্নীতি, সরকারি ঘুষ কিংবা শিল্প-সংস্কৃতি ইত্যাদি কোনও কিছু নিয়েই সিরিয়াসলি ভাবে না। কিন্তু কথা বলে প্রচুর, পোস্ট দেয় ভুরিভুরি, কিন্তু ভাবে না একটুও। আসলে মানুষ আজ শুধু করোনা নিয়ে নয়, প্রায় নিজেদের রোজনামচার বেঁচে থাকার ব্যাপারেও উদাসীন। আর এই ঔদাসীন্যই আজ ৩.২২লক্ষের খতিয়ান।

আর তাই এই সময়ে শুধু মাস্ক পরুন ও স্যানিটাইজার ব্যবহার করুন যথেষ্ট নয়, কীভাবে করবেন তার প্রচারই বেশি প্রয়োজন। কিন্তু কে করবে সেই প্রচার, কে হবে বিশ্বাসযোগ্য মুখ? আর তাই ৮.৪৫-এর ভাষণে প্রধানমন্ত্রীকে লকডাউন যাতে আর না করতে হয় সরকারকে সেজন্য সকলকে করোনা বিধি মেনে চলার উপদেশ দিতে হয় – কেননা তিনিও জানেন মানুষ করোনাকে নয় রুটি-ভাতের জোগানে বাধা লকডাউনকে বেশি ভয় পায়।

1 comment:

I am waiting for your valuable comment. Please comment. Thank you..